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मैच डे क्रिकेट
2026 डीआरएस: 5 जरूरी तथ्य

2026 डीआरएस: 5 जरूरी तथ्य

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) का निर्णय समीक्षा तंत्र यानी डीआरएस, अंतरराष्ट्रीय और कई घरेलू क्रिकेट मुकाबलों में मैदानी अंपायर के फैसले की तकनीकी जांच करता है। यह प्रक्रिया मुख्यतः हॉक-आई गेंद...

20 अक्टूबर 2026 §

2026 डीआरएस: 5 जरूरी तथ्य

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) का निर्णय समीक्षा तंत्र यानी डीआरएस, अंतरराष्ट्रीय और कई घरेलू क्रिकेट मुकाबलों में मैदानी अंपायर के फैसले की तकनीकी जांच करता है। यह प्रक्रिया मुख्यतः हॉक-आई गेंद-पथ विश्लेषण, अल्ट्राएज ध्वनि तकनीक और कभी-कभी हॉट स्पॉट पर निर्भर रहती है। टीम को आम तौर पर निर्णय के लगभग 15 सेकंड के भीतर समीक्षा मांगनी होती है, जबकि उपलब्ध समीक्षाओं की संख्या प्रतियोगिता और प्रारूप के अनुसार बदलती है। एलबीडब्ल्यू में गेंद का पिच होना, पैड से टकराने का स्थान और विकेट तक पहुंचने का अनुमान निर्णायक होते हैं; सीमांत स्थिति में अंपायर्स कॉल मूल फैसला बनाए रखती है। 2026 में सही समझ यही है कि डीआरएस गलती सुधारता है, अंपायर को स्वतः प्रतिस्थापित नहीं करता। समीक्षा लेने से पहले समय, फैसला और उपलब्ध रिव्यू ध्यान से जांचें।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैदान पर तीसरा अंपायर डीआरएस स्क्रीन और गेंद-पथ ग्राफिक्स देखता हुआ

मैच देखते समय खिलाड़ी दोनों हाथों से अंग्रेजी के अक्षर “टी” जैसा संकेत करता है और मामला तीसरे अंपायर तक पहुंचता है। मगर केवल संकेत कर देना पर्याप्त नहीं है; कप्तान या बल्लेबाज को निर्धारित समय में स्पष्ट रूप से समीक्षा का अनुरोध करना होता है। यही वह छोटी-सी प्रक्रिया है जिसे दर्शक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, और फिर पूछते हैं—फैसला क्यों नहीं बदला? मैच डे क्रिकेट पर डीआरएस समझते समय सबसे पहले यह अंतर याद रखिए: तकनीक प्रमाण देती है, अंतिम व्याख्या मैच अधिकारियों की प्रक्रिया के भीतर होती है। क्रिकेट के अंपायरिंग नियमों की शुरुआती मार्गदर्शिका

ताजा नियमों और प्रतियोगिता-विशेष शर्तों के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के आधिकारिक नियम देखना अधिक सुरक्षित है। पुराने वीडियो, सामाजिक मीडिया की छोटी क्लिप या अधूरी कमेंट्री पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण है, क्योंकि टेस्ट, एकदिवसीय और ट्वेंटी-20 में रिव्यू की संख्या तथा कुछ प्रक्रियाएं अलग हो सकती हैं। अब मूल ढांचे को क्रम से समझिए।

यह विवरण उपयोगी लगे तो नियमों की पूरी तस्वीर यहीं से स्पष्ट कर लें।

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2025 से पहले क्रिकेट में डीआरएस कैसे काम करता था?

2025 से पहले डीआरएस का मूल ढांचा वही था जो आज भी दिखाई देता है: खिलाड़ी सीमित समीक्षा मांगते थे, तीसरा अंपायर उपलब्ध दृश्य और ध्वनि प्रमाण जांचता था, तथा मैदानी अंपायर का फैसला तभी बदला जाता था जब प्रमाण पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो। एलबीडब्ल्यू में गेंद का पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट—इन तीन चरणों को अलग-अलग देखा जाता है। इसलिए “गेंद स्टंप पर लगती दिख रही थी” कहना अकेले पर्याप्त निष्कर्ष नहीं है; पहले यह देखना पड़ता है कि गेंद वैध क्षेत्र में पिच हुई या नहीं और इम्पैक्ट नियमों के भीतर था या नहीं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के समीक्षा प्रोटोकॉल में तकनीकी जांच और मैदानी निर्णय के संबंध को इसी तरह समझाया जाता है।

उस समय भी समीक्षा की सामान्य समयसीमा लगभग 15 सेकंड थी, लेकिन प्रसारण व्यवस्था, प्रतियोगिता की शर्तें और उपलब्ध उपकरण हर मैदान पर समान नहीं होते थे। सफल समीक्षा पर टीम की समीक्षा बच सकती थी, जबकि स्पष्ट रूप से गलत चुनौती पर वह समाप्त हो जाती थी; अंपायर्स कॉल को कई परिस्थितियों में असफल समीक्षा नहीं माना जाता। यहां एक महत्वपूर्ण बारीकी है: डीआरएस “सही फैसला खोजने” का असीमित अधिकार नहीं देता, बल्कि वह केवल समीक्षा योग्य निर्णय और उपलब्ध तकनीकी प्रमाण तक सीमित रहता है। मैरीलबोन क्रिकेट क्लब के नियमों का मूल सिद्धांत—“अंपायर का निर्णय अंतिम रहेगा”—आज भी इस व्यवस्था की आधारभूत सोच समझाता है।

पुरानी व्यवस्था को समझने के लिए इन तीन चरणों को याद रखें:

  1. मैदानी अंपायर फैसला देता है और गेंद मृत घोषित होने की प्रक्रिया पूरी होती है।
  2. बल्लेबाज या कप्तान तय समय में दोनों हाथों से “टी” संकेत करके समीक्षा मांगता है।
  3. तीसरा अंपायर उपलब्ध कोण, ध्वनि, गेंद-पथ और नियमों के आधार पर परिणाम लौटाता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर करीबी फैसला बदल जाएगा। हॉक-आई का अनुमान भी उपलब्ध कैमरा कोण, गेंद की गति और रिलीज के बाद उसके पथ पर आधारित होता है। गेंद के बल्ले से हल्के स्पर्श का पता लगाने में अल्ट्राएज उपयोगी है, लेकिन आवाज का स्रोत केवल बल्ला ही हो, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। मैदान का शोर, जूते की आवाज और पैड का संपर्क भी जांच की व्याख्या को प्रभावित कर सकते हैं। एलबीडब्ल्यू नियम और गेंद-पथ समझने की मार्गदर्शिका

2026 में डीआरएस में क्या बदलाव आया?

2026 में डीआरएस का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव कोई सार्वभौमिक एकल नियम नहीं, बल्कि प्रतियोगिता-विशेष खेल शर्तों पर बढ़ता जोर है। आईसीसी, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और अन्य आयोजक समीक्षा की संख्या, तकनीकी उपलब्धता, समय-सीमा और असफल समीक्षा की व्याख्या अपनी घोषित शर्तों में तय कर सकते हैं। इसलिए किसी 2026 टेस्ट मैच का नियम सीधे किसी ट्वेंटी-20 लीग पर लागू मानना गलत है। नवीनतम खेल शर्तें पढ़ना जरूरी है—वरना आप नियम नहीं, केवल अनुमान पढ़ रहे होंगे।

डीआरएस में प्रयुक्त तकनीक भी एक ही उपकरण नहीं है। हॉक-आई गेंद की उड़ान को कई कैमरा कोणों से पुनर्निर्मित करके एलबीडब्ल्यू में संभावित विकेट-टकराव दिखाता है। अल्ट्राएज या स्निकोमीटर गेंद और बल्ले के पास बनने वाले ध्वनि संकेत का विश्लेषण करता है। हॉट स्पॉट, जहां उपलब्ध हो, इन्फ्रारेड छवियों से संपर्क क्षेत्र का संकेत दे सकता है। इन तकनीकों के परिणामों को तीसरा अंपायर मैच की परिस्थिति, मैदानी अंपायर की रिपोर्ट और नियमों के साथ पढ़ता है; कोई ग्राफिक अपने-आप फैसला नहीं बनता।

2026 में दर्शकों के लिए दो व्यावहारिक बातें खास हैं:

  • समीक्षा का अनुरोध समय समाप्त होने से पहले स्पष्ट रूप से किया जाना चाहिए; कप्तान और खिलाड़ी के बीच देर से हुई चर्चा जोखिम पैदा करती है।
  • तकनीकी प्रसारण ग्राफिक और अंतिम निर्णय अलग चीजें हैं; ग्राफिक पर “अंपायर्स कॉल” दिखने का अर्थ मूल फैसला बरकरार रहना है।
  • हर प्रतियोगिता में समीक्षा की संख्या समान नहीं होती; आधिकारिक खेल शर्तों को प्राथमिक स्रोत मानें।
  • गेंद मृत होने, नो-बॉल जांच और समीक्षा योग्य निर्णय की सीमा भी प्रतियोगिता की शर्तों से प्रभावित हो सकती है।

समीक्षा प्रणाली में अक्सर भ्रम इसलिए पैदा होता है क्योंकि दर्शक परिणाम देखते हैं, प्रक्रिया नहीं। उदाहरण के लिए, यदि गेंद का अनुमानित हिस्सा विकेट से टकराता है लेकिन इम्पैक्ट सीमांत क्षेत्र में है, तो मूल नॉट-आउट फैसला कायम रह सकता है। इसी तरह, यदि मैदानी अंपायर ने बल्लेबाज को आउट दिया और हॉक-आई अंपायर्स कॉल दिखाता है, तो आउट फैसला बरकरार रह सकता है तथा टीम की समीक्षा नियमों के अनुसार बच सकती है। यह तकनीकी “विफलता” नहीं, निर्णय सीमा का निर्धारित उपयोग है।

2026 की प्रतियोगिता-विशेष शर्तों को समझने के लिए आधिकारिक दस्तावेज ही देखें, क्योंकि नियमों के छोटे अंतर मैच की रणनीति बदल सकते हैं।

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खिलाड़ियों के लिए क्या बदला?

खिलाड़ियों के लिए डीआरएस ने अपील से अधिक निर्णय-प्रबंधन को महत्वपूर्ण बना दिया है। कप्तान को केवल यह नहीं पूछना होता कि गेंद बल्ले से लगी या नहीं; उसे यह भी आंकना पड़ता है कि उपलब्ध प्रमाण मूल फैसला बदलने के लिए पर्याप्त होगा या नहीं। बल्लेबाज को आउट दिए जाने पर समय बहुत सीमित रहता है, जबकि नॉट-आउट एलबीडब्ल्यू चुनौती में कप्तान को गेंद की दिशा, इम्पैक्ट और बल्लेबाज की स्थिति तेजी से समझनी पड़ती है। यही कारण है कि कुछ टीमें विकेटकीपर, गेंदबाज और कप्तान के बीच पूर्वनिर्धारित संकेतों का उपयोग करती हैं।

मैच की रणनीति में डीआरएस का प्रभाव कई स्तरों पर दिखता है। तेज गेंदबाज एलबीडब्ल्यू अपील के समय बल्लेबाज के आगे बढ़ने, गेंद के पिचिंग स्थान और कोण पर ध्यान देता है। विकेटकीपर बल्ले के किनारे की आवाज या गेंद के दस्ताने के पास से गुजरने का संकेत कप्तान को दे सकता है। बल्लेबाज, दूसरी ओर, बल्ला-पैड के निकट संपर्क और गेंद की ऊंचाई के बारे में जानकारी देता है। फिर भी मैदान पर आत्मविश्वास से चिल्लाना प्रमाण नहीं है—अंतिम निर्णय तकनीकी जांच और नियमों से तय होगा।

समीक्षा लेने से पहले यह छोटी जांच उपयोगी है:

  1. क्या गेंद बल्ले से लगी होने की वास्तविक संभावना है?
  2. एलबीडब्ल्यू में गेंद कहां पिच हुई और इम्पैक्ट कहां हुआ?
  3. क्या उपलब्ध समीक्षा बची है और प्रतियोगिता में इस निर्णय की समीक्षा मान्य है?
  4. क्या समयसीमा समाप्त होने से पहले कप्तान स्पष्ट संकेत दे सकता है?
  5. क्या टीम अंपायर्स कॉल की स्थिति स्वीकार करने के लिए तैयार है?

यहां एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण बिंदु है: डीआरएस गेंदबाज की हर अपील का बीमा नहीं है। यदि गेंद पैड से टकराने से पहले बल्ले से लगी, तो बाद का एलबीडब्ल्यू विश्लेषण महत्वहीन हो सकता है। इसी तरह, कैच समीक्षा में अल्ट्राएज पर छोटी ध्वनि दिखना तभी निर्णायक बनता है जब गेंद और बल्ले का समय, स्थान और संपर्क एक-दूसरे से मेल खाते हों। इसलिए “स्पाइक दिखा” कहना अधूरा विश्लेषण है। बल्लेबाजी और गेंदबाजी रणनीति के उन्नत पहलू

मैच डे क्रिकेट की खिलाड़ी-आंकड़ा और मैच-समीक्षा सामग्री में डीआरएस को केवल विवाद के रूप में नहीं, रणनीतिक संसाधन के रूप में देखना चाहिए। बची हुई समीक्षा पारी के अंतिम ओवरों में अत्यंत मूल्यवान हो सकती है, जबकि शुरुआती ओवर में भावनात्मक चुनौती बाद में कप्तान को असहाय छोड़ सकती है। मगर अति-सावधानी भी नुकसान कर सकती है: स्पष्ट आउट पर समीक्षा न लेने से विकेट चला जाता है। सही तरीका भावनाओं के बजाय संकेतों, समय और नियमों का संयुक्त मूल्यांकन है।

खिलाड़ियों की निर्णय-क्षमता पर यह विश्लेषण आगे पढ़ना हो तो तकनीकी रणनीति को आंकड़ों के साथ जोड़कर देखिए।

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कप्तान विकेटकीपर और तेज गेंदबाज से डीआरएस लेने पर तनावपूर्ण चर्चा करता हुआ

अब डीआरएस का सही अर्थ क्या है?

डीआरएस का वर्तमान अर्थ “अंपायर को हटाना” नहीं, बल्कि स्पष्ट गलती को सुधारने के लिए नियंत्रित प्रमाण उपलब्ध कराना है। मैदानी अंपायर शुरुआत में निर्णय देता है, तीसरा अंपायर समीक्षा करता है और निर्धारित नियम अंतिम सीमा तय करते हैं। यह संतुलन इसलिए आवश्यक है क्योंकि कैमरा, ध्वनि और गेंद-पथ मॉडल भी वास्तविक घटना का तकनीकी पुनर्निर्माण हैं, स्वयं घटना नहीं। अगर आप हर प्रसारण ग्राफिक को निर्विवाद सत्य समझ लेते हैं, तो यहीं गलती होती है।

एलबीडब्ल्यू में अंपायर्स कॉल को लेकर सबसे अधिक बहस होती है। इसका उद्देश्य यह स्वीकार करना है कि गेंद के भविष्य के पथ का अनुमान एक सीमा तक अनिश्चित हो सकता है। यदि अनुमानित क्षेत्र केवल विकेट के हिस्से को छूता है, तो प्रणाली मूल मैदानी निर्णय को प्राथमिकता देती है। इससे दोनों पक्षों को समान अवसर मिलता है: अंपायर का नजदीकी फैसला पूरी तरह मिटता नहीं और समीक्षा लेने वाली टीम को स्पष्ट गलती होने पर सुधार मिलता है। यह व्यवस्था कुछ दर्शकों को असंगत लग सकती है, लेकिन इसके पीछे अनुमान की सीमा और मैदानी अधिकारी की भूमिका दोनों हैं।

डीआरएस समझने का व्यावहारिक सूत्र यह है:

  • “आउट” और “नॉट आउट” को अलग प्रारंभिक अवस्थाएं मानें।
  • तकनीकी प्रमाण को उसी प्रश्न तक सीमित रखें जिसके लिए समीक्षा मांगी गई है।
  • अंपायर्स कॉल को फैसला बदलने वाला परिणाम नहीं, मूल निर्णय बनाए रखने वाली स्थिति समझें।
  • रिव्यू संख्या और समयसीमा के लिए उसी प्रतियोगिता का आधिकारिक दस्तावेज देखें।
  • स्क्रीन पर दिख रहे रंग, आवाज या तीर को नियमों से अलग करके न पढ़ें।

एक और सूक्ष्म बात है: नो-बॉल और कैच जैसे प्रसंगों में समीक्षा का दायरा केवल अपील के शब्दों से नहीं, खेल शर्तों और तीसरे अंपायर की जांच से निर्धारित हो सकता है। कुछ प्रतियोगिताओं में तीसरा अंपायर संभावित फ्रंट-फुट नो-बॉल भी देख सकता है, जबकि अन्य प्रक्रियाएं अलग प्रारूप में हो सकती हैं। इसलिए 2026 के किसी एक टूर्नामेंट की क्लिप को दूसरे टूर्नामेंट का सार्वभौमिक नियम मानना अनुचित है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद का खेल शर्तियां संग्रह पढ़कर ही निश्चित निष्कर्ष निकालें।

निष्पक्षता के संदर्भ में मैरीलबोन क्रिकेट क्लब के क्रिकेट नियम भी उपयोगी हैं। उनका सिद्धांत संक्षेप में यही है कि अंपायर की भूमिका बनी रहती है, जबकि तकनीक निर्णय की जांच को अधिक पारदर्शी बनाती है। यही कारण है कि डीआरएस मैच का सहायक है, स्वयं मैच अधिकारी नहीं।

हॉक-आई गेंद पथ, अल्ट्राएज ध्वनि तरंग और एलबीडब्ल्यू ग्राफिक्स वाली प्रसारण नियंत्रण स्क्रीन

अब अंतिम हिस्से में यह देखना उपयोगी है कि अगले कुछ महीनों में डीआरएस को लेकर कौन-से विकास संभावित हैं—और किन बातों को केवल अटकल समझना चाहिए।

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अगली तिमाही के लिए डीआरएस की तीन संभावनाएं क्या हैं?

अगली तिमाही में डीआरएस से जुड़ी सबसे यथार्थवादी संभावनाएं तकनीकी विस्तार, नियमों की अधिक स्पष्ट घोषणा और दर्शकों के लिए बेहतर दृश्य व्याख्या हैं। किसी एक निश्चित बदलाव की घोषणा के बिना इससे आगे का दावा करना सुरक्षित नहीं होगा। आईसीसी, प्रसारण साझेदार और घरेलू आयोजक अलग-अलग संसाधनों के आधार पर व्यवस्था लागू कर सकते हैं, इसलिए हर श्रृंखला की आधिकारिक खेल शर्तें निर्णायक रहेंगी।

पहली संभावना तकनीकी पारदर्शिता की है। दर्शक केवल अंतिम शब्द सुनने के बजाय गेंद-पथ, संपर्क-बिंदु और निर्णय की सीमा को अधिक स्पष्ट रूप में देखना चाहते हैं। इससे “अंपायर्स कॉल” की समझ बेहतर हो सकती है, हालांकि अधिक ग्राफिक्स अपने-आप अधिक निष्पक्षता सिद्ध नहीं करते। दूसरी संभावना प्रक्रिया-समय की अधिक स्पष्ट निगरानी है, विशेषकर उन क्षणों में जब कप्तान और खिलाड़ी समीक्षा संकेत देने से पहले आपस में चर्चा करते हैं। तीसरी संभावना अलग प्रारूपों में नियमों की तुलना योग्य प्रस्तुति है, ताकि दर्शकों को टेस्ट और ट्वेंटी-20 के बीच अंतर पहले से पता हो।

अगली तिमाही के लिए ध्यान देने योग्य तीन संकेत:

  1. क्या आयोजक समीक्षा की संख्या और बची हुई समीक्षा की स्थिति स्पष्ट रूप से प्रकाशित करता है?
  2. क्या प्रसारण में अंपायर्स कॉल, अल्ट्राएज और गेंद-पथ का अर्थ समझाया जाता है?
  3. क्या कप्तानों और खिलाड़ियों को समयसीमा तथा समीक्षा-योग्य निर्णयों पर पहले से प्रशिक्षण दिया जाता है?

इन संकेतों पर नजर रखना उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो मैच समीक्षा, खिलाड़ी आंकड़े और रणनीतिक विश्लेषण पढ़ते हैं। मगर सावधान रहिए: किसी वायरल विवाद को नियम परिवर्तन का प्रमाण मत मानिए। आधिकारिक आईसीसी दस्तावेज, प्रतियोगिता की खेल शर्तें और विश्वसनीय प्रसारण विवरण—इन तीन स्रोतों का मिलान किए बिना निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

अंततः, क्रिकेट में डीआरएस कैसे काम करता है का उत्तर पांच शब्दों में नहीं समा सकता। यह सीमित समय, सीमित समीक्षाओं, हॉक-आई, अल्ट्राएज, मैदानी अंपायर और अंपायर्स कॉल का संयुक्त ढांचा है। तकनीक स्पष्ट गलती सुधार सकती है, लेकिन अनुमान की सीमा, नियमों की भाषा और मानव निर्णय अब भी केंद्र में रहते हैं। अगली बार खिलाड़ी “टी” संकेत करे, तो केवल स्क्रीन पर तीर मत देखिए—पहले यह पहचानिए कि समीक्षा किस प्रश्न का उत्तर खोज रही है।

इस विषय पर मैच समीक्षा और खिलाड़ी आंकड़ों की अगली जानकारी के लिए हमारे क्रिकेट-केंद्रित विश्लेषण से जुड़े रहें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न: क्रिकेट में डीआरएस क्या है?

उत्तर: डीआरएस ऐसी तकनीकी समीक्षा प्रणाली है जो मैदानी अंपायर के कुछ फैसलों की दोबारा जांच कराती है। इसमें तीसरा अंपायर हॉक-आई गेंद-पथ, अल्ट्राएज ध्वनि और उपलब्ध कैमरा कोणों का उपयोग कर सकता है। इसका उद्देश्य स्पष्ट गलतियों को कम करना है, न कि हर करीबी फैसला बदलना। एलबीडब्ल्यू, कैच और कुछ अन्य निर्णयों की समीक्षा प्रतियोगिता की खेल शर्तों के अनुसार की जाती है।

प्रश्न: डीआरएस कैसे लिया जाता है?

उत्तर: समीक्षा लेने के लिए बल्लेबाज या फील्डिंग कप्तान को आम तौर पर लगभग 15 सेकंड के भीतर दोनों हाथों से “टी” संकेत करना होता है। मैदानी अंपायर अनुरोध स्वीकार करके तीसरे अंपायर को मामला भेजता है। कप्तान को पहले यह जांचना चाहिए कि समीक्षा उपलब्ध है, निर्णय समीक्षा योग्य है और समय समाप्त नहीं हुआ। देर से किया गया संकेत स्वीकार नहीं किया जा सकता।

प्रश्न: एलबीडब्ल्यू में हॉक-आई क्या देखता है?

उत्तर: एलबीडब्ल्यू समीक्षा में हॉक-आई मुख्यतः पिचिंग, इम्पैक्ट और विकेट—इन तीन चरणों का अनुमान देखता है। पहले गेंद के पिच होने का स्थान, फिर पैड से संपर्क का बिंदु और अंत में स्टंप तक संभावित पथ जांचा जाता है। यदि कोई चरण नियमों के अनुसार उपयुक्त नहीं है, तो एलबीडब्ल्यू फैसला नहीं बनता। सीमांत विकेट-पथ पर अंपायर्स कॉल लागू हो सकती है।

प्रश्न: अंपायर्स कॉल और नॉट आउट में क्या अंतर है?

उत्तर: नॉट आउट मूल फैसला होता है, जबकि अंपायर्स कॉल तकनीकी रूप से सीमांत परिणाम आने पर मूल अंपायर का फैसला बनाए रखती है। यदि मैदानी अंपायर ने नॉट आउट दिया और गेंद का अनुमान सीमांत है, तो नॉट आउट कायम रहेगा; आउट दिए जाने पर आउट बना रह सकता है। समीक्षा बचने या समाप्त होने का प्रभाव प्रतियोगिता के आधिकारिक नियमों पर निर्भर करता है।

प्रश्न: डीआरएस की समीक्षा कितनी बार मिलती है?

उत्तर: डीआरएस की समीक्षा की संख्या प्रारूप और प्रतियोगिता की खेल शर्तों के अनुसार बदलती है, इसलिए हर मैच के लिए एक सार्वभौमिक संख्या नहीं बताई जा सकती। कई अंतरराष्ट्रीय प्रारूपों में टीमों को पारी के दौरान सीमित समीक्षाएं मिलती हैं, लेकिन सटीक संख्या आईसीसी या संबंधित आयोजक घोषित करता है। सफल समीक्षा और अंपायर्स कॉल के बाद समीक्षा बचने के नियम भी दस्तावेज के अनुसार जांचें।

प्रश्न: डीआरएस काम न करे या तकनीकी समस्या आए तो क्या होता है?

उत्तर: तकनीकी समस्या आने पर तीसरा अंपायर उपलब्ध कैमरा, ध्वनि और नियमों के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ाता है या मैदानी निर्णय बनाए रखता है। हॉक-आई, अल्ट्राएज या संचार प्रणाली उपलब्ध न होने पर समीक्षा का दायरा सीमित हो सकता है। ऐसी स्थिति में मैच अधिकारी और प्रतियोगिता की खेल शर्तियां प्राथमिक होती हैं। दर्शकों को अधूरे ग्राफिक्स के आधार पर फैसला घोषित नहीं करना चाहिए।

प्रश्न: क्या डीआरएस हर अंपायर की गलती सुधार सकता है?

उत्तर: नहीं, डीआरएस केवल समीक्षा योग्य निर्णयों और उपलब्ध तकनीकी प्रमाण तक सीमित रहता है। यह मैदानी अंपायर की हर व्याख्या, हर अपील या हर नियमगत प्रश्न को स्वतः नहीं बदलता। गेंद मृत होने का समय, समीक्षा की समयसीमा और प्रतियोगिता की शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए डीआरएस को अंपायर का विकल्प नहीं, नियंत्रित तकनीकी सहायता समझना अधिक सही है।

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